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seema


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बाबाओं के चक्रव्यूह से कैसे बचे भारत भूमि

Posted On: 26 Aug, 2017  
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E SAINIK TUJHE SALAAM (POEM )

Posted On: 19 Sep, 2016  
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एक खुली चिट्ठी-पी.एम. की (कविता )

Posted On: 16 Aug, 2015  
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चुनाव अभियान………..

Posted On: 12 Apr, 2014  
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AUR VO CHALI GAEE

Posted On: 22 Feb, 2014  
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लोअ लेवल विद्यार्थी ASHORT STORY ( CONTEST )

Posted On: 27 Jan, 2014  
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मुखौटा(लघुकथा )- CONTEST

Posted On: 23 Jan, 2014  
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अज्ञात कन्या का मर्म poem – contest

Posted On: 18 Jan, 2014  
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Contest Others social issues कविता में

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माँ शारदे प्रश्नावली POEM – CONTEST

Posted On: 13 Jan, 2014  
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खट्टी-मीट्ठी यादें – २.अम्मा सब्बा ( contest संस्मरण )

Posted On: 9 Jan, 2014  
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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

के द्वारा: yogi sarswat yogi sarswat

के द्वारा: jlsingh jlsingh

के द्वारा: yatindranathchaturvedi yatindranathchaturvedi

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पर तुम भी तो जान गए नियत सबकी पहचान गए देखा लोगों का आकर्षण करने लगे इक्कठा धन कीमत रख दी पाँच रुपैया क्या बच्चा , बूढा क्या भैया क्या करे मजदूर बेचारा फिरे जो दिन भर मारा मारा इक –इक पैसा जोड़ के रखता भूखे पेट काम वो करता कैसे पाँच रुपए जुटाए ? कैसे तेरी सभा में आए ? कितनी तेरी वाणी अनमोल लगाने लगे उसी का मोल सोच रही हूँ मोदी तुम जिस दिन पी.एम् . बन जाओगे एक झलक दिखलाने का तुम लाखों अरबों पाओगे दो तीन बातें स्पष्ट होनी चाहिए आदरणीय सीमा जी ! १२ साल के मुख्या मंत्री काल में आज तक मोदी पर एक भी पैसे का गबन नहीं लगा ! वो किसके लिए गबन करेंगे , न कोई आगे न पीछे ! दूसरी बात - ये पैसा उत्तराखंड में जा रहा है ! तीसरी बात -आज़ादी के बाद मोदी ऐसा पहला नेता है जिसे लोग पैसे देकर भी सुनाने जाते हैं अन्यथा तो लोगों को रैली तक लाने के लिए पैसे और दारू देनी होती है !

के द्वारा: yogi sarswat yogi sarswat

के द्वारा: Madan Mohan saxena Madan Mohan saxena

के द्वारा: Bhagwan Babu Bhagwan Babu

के द्वारा: seemakanwal seemakanwal

नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments yamunapathak के द्वारा August 22, 2013 BEHATAREEN BLOG yogi sarswat के द्वारा August 21, 2013 भारत में हो गयी ये कैसी सभ्यता शुरू ? कहाँ गयी वो माँ जो अच्छे संस्कार दे | कल रात मेरे पास आ गयी माँ शारदे | तीसरा सवाल- जल रही क्यों बेटियाँ ? रानी बनाकर राज कर रही क्यों चेटियाँ ? क्यों माँ लगाती मोल स्व बेटे का इस तरह व्यापारी बेचता हो कुछ सामान जिस तरह ? क्यों बेटियों को जन्म से पहले ही मार दे ? कल रात मेरे पास आ गयी माँ शारदे चौथा सवाल – बोलो ये है जाति-पाति क्या ? खो गयी क्यों आज सारी कोमलता दया ? क्यों धर्म के नाम पर भगवान को बांटा ? मानवता के नाम पर क्यों चुभ रहा काँटा ? शर्मो-हया के गहने नारी क्यों उतार दे ? बहुत सुन्दर और सार्थक शब्द आदरणीय सीमा जी ! बधाई harirawat के द्वारा August 18, 2013 सुन्दर रचना साधुवाद ! harirawat के द्वारा August 18, 2013 सीमा जी सुन्दर रचना के लिए साधुवाद ! यही प्रश्न कभी यक्ष ने किसी भ्रष्ट नेता से कर दिए थे, उसने अपनी बतीसी निकाल कर जबाब देने में अपनी असमर्थता दिखा दी थी ! अब सन २०१४ में जनता ही दे पाएगी इन प्रश्नों का उतर ! harirawat के द्वारा August 18, 2013 सीमा जी बहुत ही सुन्दर कलात्मक जनता की असली आवाज है आपकी रचना ! देश के हर पीड़ित द्वारा पूछे गए प्रश्न हैं ये ! जिनका जबाब न भ्रष्ट, चोर लुटेरे राज नेताओं के पास है और न नौकरशाहों के पास ! हाँ जनता के पास जरुर है अपनी वोटों की ताकत से इन भ्रष्ट राज नेताओं को इन्हें इनकी हकीकत का ऐना दिखाकर ! हरेन्द्र जागते रहो ,

के द्वारा: seema seema

मां शारदे,,, तुम बुदधी, बिध्या की जननी हो, कारक हो , शक्ति हो ,प्रक्रती हो, सब कुछ प्रकति के नियमानुसार ही होता है फिर क्यों हो बैचैन ,,,,,,,,,सब कुछ तो तुम ही अपने नियमानूसार ही तो करती हो उन सिद्धांत को कोई नहीं काट सकता है भगवान भी वहां तुम शक्ति के विना असहाय होते हैं  अतः सब प्रक्रति का रूप समझ कर बैचैन होना व्यर्थ है         ,,,वैचैन मनुष्य ही हो सकता है   ,,  मां शारदे,,,,,,, तुम तो कमलासन मैं विराजमान मंद मंद मुष्कराती वीणा  वादन कर अपनेी स्रष्टि का अवलोकन करती  रहो  ,,,, जो जैसा करेगा नियमानुसार वैसा ही भरेगा ,,,,,,       ,,,,,,,,,,, ,,,,,,, ,,,,,,हम तो यही आशा व आकांक्षा कर सकते है ,,,,,,,,,,,,,ओम शांति ,,,,,,,,शांति ,,,,,,शांति ,,,,,,

के द्वारा:

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के द्वारा: Nikhil Nikhil

के द्वारा: Sumit Sangwan Sumit Sangwan

के द्वारा: yatindranathchaturvedi yatindranathchaturvedi

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आपने कहा की " दर्द दिल में होता है , जिसको दुःख होगा दर्द उसके चहरे पर स्वाभाविक रूप से आएगा | ये कोइ बिकाऊ चीज़ नहीं है जिसकी खरीदा और ओढ़ लिया | जितना घिनौना अपराध उसके साथ हुआ , ऐसे जख्म ताउम्र कभी नहीं भरते | फिर उसका ऐसे बात करना जैसे यह सब उसकी आप बीती न होकर कोइ फ़िल्मी कहानी हो …..गले नहीं उतरा |" फिर क्यों भावना प्रधान फिल्में दिखाकर नायक नायिका दर्शकों की आँखों मे आँसू ले आते है...... इसी कार्यक्रम के पहले ही भाग मे न केवल दर्शक दीर्घा मे बैठे लोगों के अपितु कई अन्य लोगों के जो टीवी पर इसे देख रहे थे..... उनकी आँखों मे आँसू थे......... क्या उन्होने भ्रूण हत्या का दर्द झेला है........ या क्या फिल्मी घटनाएँ उनके जीवन से गुजरी थीं........ क्यों....... फिर आपने कहा की "स्वाभाविक है जो बात मैंने पकड़ी , उसको आमिर खान कभी पकड़ने का साहस भी नहीं करेगा | घोड़ा अगर घास से दुश्मनी करेगा तो क्या खाएगा | यह अभियान उसने मुफ्त में तो चलाया नहीं है | सूना है एक एपीसोड के लिए तीन करोड़ | इस भौतिकवाद की दुनिया में ऐसा गधा भला कौन होगा ….?" तो जब आपने खुद को आमिर से बड़ा परफेक्शनिस्ट घोषित कर ही चुकी हैं तो मेरा कुछ भी बोलना व्यर्थ हैं........... और ऊपर से टॉप ब्लॉग मे आपके ब्लॉग का शामिल होना आपको स्वत: ही परफेक्शनिस्ट घोषित कर ही देता है.......

के द्वारा: Piyush Kumar Pant Piyush Kumar Pant

धन्यवाद पीयूष जी , जो आपने अपना कीमती समय निकाल कर मेरे हर प्रश्न का उत्तर दिया , मुझे आपसे ऐसे ही उत्तरोत्तर की अपेक्षा थी | अब भी मै यही कहूंगी कि जो दिखाया गया , जितना दिखाया गया , उसमे सच्चाई कितनी थी , मै नहीं ढूंढ पाई | १. आपने सही कहा कि ऐसा हो सकता है , मैं भी जानती हूँ ऐसा संभव है लेकिन एक हद तक ( एक बार , दो बार , तीन बार ......ग्यारह साल तक लगातार नहीं | २. जो नवयुवक ( हरीश आर्य ) सामने आकर बोल रहा था , वह कोइ एक्स्ट्रा ordanry तो नहीं था कि होश संभालने से पहले बलात्कार जैसे असहनीय दर्द को छ: साल की उम्र में सह जाए | अगर वास्तव में ऐसा है तो उसका नाम गिनीज़ बुक में रिकॉर्ड होना चाहिए और भारतीय सरकार द्वारा उसे पुरस्कृत करना चाहिए | ३. पीयूष जी बच्चे सभी एक जैसे ही होते हैं , तभी तो बच्चे कहलाते हैं | अगर ऐसा एक बालक के साथ ( १०+ ) हुआ होता तो बात मानने योग्य थी | छ: साल ........ कुछ हज़म नहीं होता | ४. आप खुद ही मान रहे हैं कि जब आपने अपने माँ से कुछ छुपाना चाहा , तब आप बारह साल के थे , छ: साल के नहीं | ५. बच्चा दर्द को दबा डर से भले ही रोए या चिल्लाए नहीं , पर जख्म तो जख्म है , उसको छुपाना तो असंभव है न और हरीश आर्य कोइ झुग्गी- झोम्पडी वाला बच्चा तो है नहीं | ६ .मतलब आप मानते हैं कि बच्चे के साथ हो रहे दुष्कर्म से परिवार वाले अनजान न थे | तब कुछ नहीं कर पाए , जब उसको रोकने की जरूरत थी | तो जिम्मेदार कौन.........? ७. दर्द दिल में होता है , जिसको दुःख होगा दर्द उसके चहरे पर स्वाभाविक रूप से आएगा | ये कोइ बिकाऊ चीज़ नहीं है जिसकी खरीदा और ओढ़ लिया | जितना घिनौना अपराध उसके साथ हुआ , ऐसे जख्म ताउम्र कभी नहीं भरते | फिर उसका ऐसे बात करना जैसे यह सब उसकी आप बीती न होकर कोइ फ़िल्मी कहानी हो .....गले नहीं उतरा | स्वाभाविक है जो बात मैंने पकड़ी , उसको आमिर खान कभी पकड़ने का साहस भी नहीं करेगा | घोड़ा अगर घास से दुश्मनी करेगा तो क्या खाएगा | यह अभियान उसने मुफ्त में तो चलाया नहीं है | सूना है एक एपीसोड के लिए तीन करोड़ | इस भौतिकवाद की दुनिया में ऐसा गधा भला कौन होगा ....? अभिनेता को लाकर क्या उन्हें वो वाह-वाही मिलती जो मिल रही है .......?? यह हरीश आर्य जिन्दगी लाइव में भी आकर आप-बीती सूना चुका है ( वह कार्यक्रम मैंने नहीं देखा , इस लिए कोइ टिप्पणी भी नहीं करूंगी ) अब प्रश्न यह उठता है कि जहां पर उनके आंकड़ो के मुताबिक़ ५३% बच्चे शोषण का शिकार होते है ( मतलब १.२५ अरब की आबादी में ७० करोड़ ) , उनमें से क्या एक हरीश आर्य ही मिला दोनों कार्यक्रमों में परदे पर लाने के लिए | उनको सामने क्यों नहीं लाया गया जो गंदी बस्तियों में बदत्तर जिन्दगी जीते हुए न जाने किन-किन के शोषण का शिकार होते हैं

के द्वारा: seema seema

निश्चित ही आपके हर प्रश्न का मैं उत्तर दूंगा.... आपने कहा है की (१) क्या वास्तव में ऐसा भी हो सकता है ? निश्चित ही ...... हमलोग अपने से आगे की दुनिया के बारे मे कुछ जानते ही नहीं है.... अक्सर हर वस्तु का उजला पक्ष ही हमने देखा है और दूसरा नहीं जो स्याह है... आपने पूछा है की (२) साढे छ: साल का बच्चा कम्पयूटर में माहिर हो सकता है लेकिन अपने कपडे धोने या बदलने में माहिर नहीं हो सकते । हर बच्चा एक सा नहीं होता है.... जो बच्चे लाड़ प्यार और नाज़ों से पले होते हैं.... जिनके जूते के फिते भी नौकर बांधते हैं वो भले ही हवाई जहाज़ चला लें। पर अपने जूते खुद नहीं बांध पाते हैं... आपने पूछा है की (३) एक बच्चा ( साढे छ: साल का ) जो बलात्कार का शिकार हुआ हो , क्या वह नासमझ मासूम सबकुछ सहन करके एकदम सामान्य होगा ? निश्चित ही ये दुष्कर है.... पर असंभव नहीं.... और कहीं पर भी कार्यकरम मे ये नहीं कहा गया की सभी बच्चे ऐसे ही होते है ......... वो ही लोग पर्दे पर जगह पाते हैं जो अपनी जीवटता से जिंदगी को जीते है... आपने पूछा है की (४) क्या एक बच्चे की सहन शक्ति इतनी होती है कि असहनीय पीडा को प्रक्ट न कर पाए ? इसके लिए आपको बच्चे की परवरिश का माहौल देखना पड़ेगा..... की किन हालातों मे वो है... आप किसी बच्चे को गिरने पर सहलाएँ तो वो गिरते ही रोने लगता है पर अगर गिरते ही उसकी पिटाई कर दें तो वो चोट लाग्ने पर भी दर्द को दबाकर खड़ा हो जाता है.... आपने पूछा है की (५) क्या एक मां को अपने बेटे के कपडों में लगे हुए खून के धब्बे दिखाई न दिए होंगे ? और अगर देखा होगा तो वह मां जो बच्चे की उंगली में भी मामूली सा घाव देखकर भी कराह उठती है , उसके मन में कोई डर या आशंका उत्पन्न नहीं होगी , अगर नहीं तो मुझे दुख हो रहा है कहते हुए कि ऐसी औरत को मां होने का ही अधिकार नहीं है । तो उत्तर ऊपर के प्रश्न मे ही है... हमारे एक मित्र चलती गाड़ी से उतारने के प्रयास मे गिर पड़े.. उनके न केवल घुटने छिले बल्कि पैंट भी रगड़ से फट गई॥..... तब हम 12 साल के थे.... घर मे मार के डर से वो मित्र घर के पास छुपे रहे और जैसे ही उनकी माँ छत पर कपड़े सुखाने गई वो भीतर जा कर अपने कपड़े बदलने चल दिये.... . आपने पूछा है की (६) घर में एक बच्चे से शुरु होकर कर एक युवक के साथ ग्यारह साल तक कुकर्म होता रहा और किसी को पता तक न चला …..?? ये देश आज़ादी के बाद से लगातार लूट रहा है...... क्या किसी को पता नहीं है की कैसे ..... पर क्या हो रहा है.... आपने पूछा है की ( ७) एक और बात जिसे मैने महसूस किया कि उस युवक की बात कहने का ढंग कुछ बनावटी सा लगा । न तो उसके चेहरे पर कोई हाव-भाव थे और न ही उसकी आवाज़ में कोई पीडा । बनावटी आँसू होते हैं ...... भाव अभिनेता लाता है.... दर्द उसको होता है जिसका जख्म नया हो..... एक ही बात को आदमी हर रोज अलग अलग लोगों को बता बता कर कितना दर्द लाये और कितने आँसू...... और आपको क्या लगता है जो बात आपने पकड़ ली उसे आमिर जैसा घोर व्यावसायिक नहीं पकड़ पाता .... अगर नाटक ही करना होता तो क्या वो किसी अच्छे अभिनेता को न ले आता........

के द्वारा:

आप सही कह रहे हैं नरेंद्र जी , यही बात मैं भी कह रही हूँ और मानती भी हूँ कि बाल-शोषण हमारे मध्यम वर्गीय समाज की भयानक समस्या है , जिसे ख़त्म होना चाहिए | मैंने केवल इतना कहा कि सत्यमेव जयते में जो दिखाया गया , उसमें कितना सच्च था | आपने अगर वह कड़ी देखी होगी तो सुना होगा कि साढ़े छ: साल की उम्र में उसके साथ रेप किया गया जिससे उसे ब्लीडिंग भी होती थी , उसके बाद भी वह सामान्य था और किसी को ग्यारह साल तक घर में इस बात का अहसास तक न हुआ ? ऐसा कैसे संभव है ? अगर बात केवल गलत जगह पर छूने की होती तो शायद माना जा सकता था | रेप जैसी दर्दनाक पीड़ा को सहने की शक्ति एक मासूम बच्चे में होती है , ऐसा तो संभव ही नहीं है | लेख दोबारा पढ़ कर देखिए , यकीनन आप भी सोचने पर मजबूर हो जाएंगे | एक और बात - मैंने केवल एक बच्चे की स्थिती से अवगत कराने के लिए कम्प्युटर का उदाहरण दिया था | उन्हें कम्प्युटर भले ही न मिले , फिर भी वे इतने समझदार तो नहीं होते कि अपने क्लोथ्स खुद चेंज कर सकें या वाश कर सकें ||

के द्वारा: seema seema

चन्दन जी मैं भी वही कहने का प्रयास कर रही हूं की इतना दर्द सहने के बाद तो बदन सुन्न हो जाता है | किसी बड़े के लिए भी यह बहुत कठिन है फिर एक मासूम सा साढ़े छ: साल का बच्चा इतना दर्द सहने के बाद सामान्य कैसे रहा , और किसी को उसकी पीड़ा का अहसास क्यों नहीं हुआ | मैं भी जानती हूं - जिस तन लागे वो तन जाने | हम उस पीड़ा को बांट नहीं सकते लेकिन देखने और समाझने की शक्ति हम सबको इश्वर प्रदत्त वरदान है , जो हमें दिखाया जा रहा है , उसमे कितना सत्य है ... क्या यही वास्तविक सामाजिक आइना है | मैं आपसे उन प्रश्नों के उत्तरों की उम्मीद करती हूं जो मेरे मन में उठे और बेबाकी से लिख दिए | आलेख पढ़ने और अपने बहुमूल्य विचार रखने ले लिए साधुवाद |

के द्वारा: seema seema

नमस्कार पीयूष जी , आपकी बात से सहमत हूँ की भले ही नाटय रूपांतरण हो पर समाज की सच्चाई है ...... इस बात को शो में स्पष्ट करना चाहिए की यह किसी की आप बीती नहीं बल्कि नाटय रूपांतरण है | विचारों की स्वतंत्रता सबको है , मैंने वही कहा जो मुझे सत्य लगा , एक बार फिर से यही आलेख पढ़ कर देखिए , शायद आपको भी वह सच्चाई दिखाई दे जिसे हमने बेबाकी से कह दिया है | बहुत कुछ कहना चाहती हूं लेकिन न तो उन विचारों को यूं लिखना मेरे संस्कार मुझे सिखाते हैं और न ही मेरे पास ऐसे शब्द हैं की सभ्य तरीके से कह सकूं | मैं भी समाज का हिस्सा हूं और हर सामाजिक बुराई के विरोध में मेरी कलम चली है और चलती रहेगी | मेरा कहना केवल इतना है की सच्चाई को उतना ही बढाया - चढ़ाया जाए जितना गले उतर सके , मेरे द्वारा पूछे गए प्रश्नों के उत्तर अगर आपके पास हैं तो उसकी प्रतीक्षा रहेगी | आपकी काले मुंह के उदाहरण पर चार पंक्तियाँ लिखना चाहूंगी - कुंए की जगत पर खडे हम दोनो प्यासे तुम भी थे , प्यासे हम भी थे तुमने डोल लिया पानी निकाला पिए और चल दिए हम उस गहराई में स्वयं कूद दिए प्यास तुमने बुझाई , प्यास हमने भी बुझाई तुमने वाह-वाही पाई हमने मुंह की खाई आलेख पढ़ने और अपने बहुमूल्य विचार रखने ले लिए साधुवाद |

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के द्वारा: Rajkamal Sharma Rajkamal Sharma

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रूबी कुतिया ने, बच्चों में खेल रहे, अपने पिल्ले टॉमी को डाटा, खबरदार जो तूने, किसी इन्सान के बच्चे को काटा। बेटे, बदला लेना इंसान की फितरत है, वह अपने बाप से नहीं चूकता, तुझे क्या छोड़ेगा। तेरे काटने पर, इंसान का बच्चा, अधिक से अधिक रो देगा। पर यदि उसने तुझे काट लिया तो, तू अपने कुत्ते होने का एहसास भी खो देगा। कुत्ते होने का एहसास! अरे, इसके अलाबा, और है ही क्या हम गरीबों के पास। यही वह बोध है जो हमें, वफादारी, ईमानदारी और स्वामिभक्ति, जैसे गुणों से जोड़ता है। जबकि इंसान, इन गुणों का, सिर्फ लबादा ओढ़ता है। ठीक है, हम दोगले हैं, हमारी पैदाइश अवैध है, शायद इसलिए कि, हमें अपने बाप का पता नहीं, पर इन्सान, उसे क्या कहा जाये, जिसे अपने 'आप' का पता नहीं। इसीलिए तो कहती हूँ बेटे, दूर रह इनसे, मत खेल इनके साथ, पिल्ला बोला, माँ, मेरी समझ में नहीं आती, तुम्हारी बात। तुम्हें तो मेरी हर बात, बुरी नज़र आती है, जरा सोचो, इन बच्चों की माँ मुझे, स्वादिष्ट भोजन खिलाती है। इसमें क्या हर्ज़ है? बच्चे को सुखी देखना तो, हर माँ का फ़र्ज़ है। माँ मुस्कुराई, बोली-"आखिर आ ही गया न, सोहबत का असर, हो गया न इन्सान की तरह खुदगर्ज़। और पूछता है इसमें क्या हर्ज़। बेटे, इन बातों को तू क्या जाने, अभी बच्चा है। पर याद रख, कोठी की चौकसी करने से, गलियारे का कुत्ता बना रहना, कहीं अच्छा है। जो खुद जंजीरों में जकड़ा है, वह दूसरों की रक्षा कैसे कर सकता है। जिसका स्वाभिमान ही मर चुका हो, वह, जाति, समाज और देश के लिए, कैसे मर सकता है। माँ की धिक्कार ने, बेटे में प्राण फूंक दिए, उसने मुंह के सारे पकवान थूक दिए, बोला, माँ आज से मेरे मन पर, मेरी आत्मा पर, सिर्फ और सिर्फ तेरा अधिकार है। तेरा बेटा, अब खुदगर्ज़ नहीं, खुद्दार है। मेरेऊपर जो इंसानी फितरत का असर था, आज तूने वह साफ़ कर दिया, माँ बस एकबार कह दे, मुझे माफ़ कर दिया। मेरा वादा है, तुझे दिया वचन, मैं कभी नहीं तोडूंगा। सब-कुछ छूट जाये मगर, अपना गलियारा, कभी नहीं छोडूंगा। कोठी के बच्चे और बड़े, सभी, उन दोनों को बुला रहे थे। पर वे दोनों माँ-बेटे, इंसानों से दूर, अपने गंतव्य की ओर जा रहे थे। एक पल को, दोनों ने पीछे मुड़कर देखा, और फिर चल दिए, मानो, कह चले हों, देखो, हम तुम्हारा, कुछ भी नहीं ले जा रहे हैं। हम, कुत्ते होने का एहसास लिए आये थे, और, उसी के साथ जा रहे हैं, तुमसे दूर, बहुत दूर, बहुत दूर.......

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के द्वारा: chaatak chaatak

के द्वारा: seema seema

सीमा जी प्रणाम, आप का दुख पढा, लेकिन फिर भी मेरा निवेदन यह है कि आप किसी भी रचना को साहित्य पर हमला ना माना करें. और झोला छाप जैसा शब्द प्रयोग करने से पहले लिखने का उद्देश्य क्या था इस पर विचार कर लें तो शायद आपको पीडा भी नही होगी. ये बात ठीक है कि काबिलियत किसी की मोह्ताज नही होती लेकिन शायद वो किसी के द्वारा झोला छाप कहे जाने पर दबी भी नही रह सकती. मैने जो कुछ भी अपने हस्तक्षेप ब्लाग मे लिखा उसमे कबीर जी का मजाक कहीं नही उडाया था, वो एक सामान्य व्यंग्य था जिसमे नेताओ का मजाक उडाया गया था, हॉ छंद और मात्रायें जरूर कबीर जी के दोहो जैसे लिये गये थे. या तो आप उनको समझ नही पाई या फिर आप किसी के लिखे पर स्वनिर्णय लेती हैं कि वो किस भावना से लिखा गया है. दूसरी बात मेरा अपना मत है कि कबीर जी का लेखन समाजिक ज्यादा है साहित्यिक कम है, हो सकता है मै गलत होऊ, क्यों कि मै तो कम्प्युटर के क्षेत्र से हूं. साहित्य सिर्फ पढता हूं उस पर कोई शोध नही करता. आशा है आप मेरा मत समझेंगी.. धन्यवाद.

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सीमा जी, आप लिखती बेहतरीन हैं. और आपके लेखन से ये स्पष्ट जाहिर होता है कि आप स्वयं ही संयम और मर्यादा के महत्व से अच्छी तरह वाकिफ हैं. मैंने अपनी टिप्पणी में संयम और मर्यादा को केवल स्त्रियों के ऊपर नहीं थोपा है बल्कि ये नियम पुरुष के ऊपर तो और भी कठोरता से लागू होते हैं. हॉ, नारी प्राकृतिक रूप से ही कमजोर होती है इसलिए उसकी सुरक्षा के लिए मैं बार-बार कहता हूं कि समाज के भेडिए पुरुषों से उनके बचाव के लिए उन्हें खुद ही एक सीमा का वरण कर लेना चाहिए. अन्यथा कुछ दुष्ट पुरुष इसका गलत इस्तेमाल करने से बाज नहीं आएंगे. और कानून-व्यवस्था तथा सरकारों की हालत से आप वाकिफ ही हैं. उन्हें किसी भी दुर्घटना से पल्ला झाड़ना आता ही है. कुछ नारियों का असंयम सभी नारियों के प्रति एक गलत दृष्टिकोण का जन्म दे तो इससे बड़ी त्रासदी क्या होगी.

के द्वारा: rkpandey rkpandey

धन्यवाद पांडे जी आपनें हमारी रचनाएं पढी और अपनी बहुमूल्य प्रतिक्रया व्यक्त की लेकिन शायद आपसे कविता का मूल भाव समझने में चूक हुई है या फिर आप वो वाकया नहीं जानते जिस पर ये कविता " जब पुरुष नें कहा ......" लिखी गयी थी | मैं नारी आज़ादी की पक्षधर हूँ और आज़ादी की अपनी कुछ सीमाएं हैं | संयम और मर्यादा का पालन केवल नारी को ही नहीं बल्कि पुरुष क भी करना चाहिए तभी हमारा समाज सुधर सकता है | नियंत्रण नारी के लिए ही क्यों पुरुष को भी अपने आप में नियंत्रण रखना चाहिए और उसे भी उन सीमाओं का पालन करना चाहिए जिसमें वह नारी को बांधना चाहता है | जब पुरुष किसी बंधन में बंध कर नहीं रह सकता तो नारी को भी अपने बनाए बंधनों में बांधने का अधिकार उसे नहीं है | खैर ये एक न ख़त्म होने वाली बहस है | केवल बोलने मात्र से इसका कोइ हल निकलने वाला नहीं है | आपको मेरी बाल-कविता पसंद आई उसके लिए मुझे बहुत खुशी है | धन्यवाद |

के द्वारा: seema seema

सबसे पहले तो १५ अगस्त की हार्दिक शुभकामनाये. हालाँकि, इस लेख में ऐसा कुछ नहीं है जिसका मैं विरोध करूँ, फिर भी मैं कुछ लिखने को मजबूर हूँ. मुझे यह समझ में नहीं आता की आप कैसी और किस तरह की स्वतंत्रता चाहती हैं? हाँ, आप इसे मेरी पुरुषवादी सोच कह कर ख़ारिज कर सकती है, पर मुझे यह लगता है की अपने अपने दायरे के भीतर सब स्वतन्त्र हैं.फिलहाल मैं उन पुरुषो की बात नहीं कर रहा हूँ जो सरे आम कुछ भी कर गुजरने से नहीं चूकते. मेरा ये मनना है की शारीरिक रूप से भी स्त्री पुरुष से सबल होती है. लेकिन अपनी स्वभावगत लज्जा के कारण वो इसका प्रदर्शन नहीं कर सकती. अपनी इच्छा शक्ति को प्रबल रखिये. जैसे वर्षो की गुलामी के बाद १५ अगस्त को देश स्वतन्त्र हुआ था, मुझे यकीं है की आप को भी अपनी मनचाही आज़ादी जरूर मिलेगी.

के द्वारा:

अनीता जी मेरे पेज पर आकर अपनी प्रतिक्रया व्यक्त करने का शुक्रिया |मुझे खेद है की आपको मेरी बात से दुःख पहुंचा , किसी को दुःख पहुंचाना हमारा ध्येय न कभी था न है और न हो सकता है | ये तो अपनी-अपनी सोच है | हर कोइ आपके या मेरे विचारों से सहमत हो ऐसा संभव नहीं | अगर आपने कुछ कहा है तो स्वाभाविक है की अगर ९०% लोग आपका पक्ष लेते हैं तो १०% आपके विचारों से असहम भी हो सकते हैं | आप समझाने में भूल कर रही हैं | यहाँ पर बात किसी आज़ादी या गुलामी की नहीं हुई और न ही मैंने कुछ ऐसा कहा है | आप भी जानती हैं की आपने एक विवाद खडा किया जो मुझे क्या बहुतों को बेतुका लगा और हमें उस पर कहने का अधिकार है , सो हमने जो कहा साधिकार कहा कुछ गलत नहीं कहा | अगर आप मुझ जैसी नारी को गुलाम कहती हैं तो मुझे नहीं जानना की आपके लिए आज़ादी के मायने क्या हैं | नारी पर होने वाले अत्याचार या किसी भी ज्यादती का मैं खुलकर विरोध करती हूँ , ये आप मेरे ब्लॉग पर मेरी रचनाएं पढ़कर स्वयम ही समझ जाएँगी और ज कहना है बेबाक कहती हूँ वो भी तर्क सहित , बिना किसी आधार के नहीं और मेरे बारे में आप जानती ही कितना हैं , हमनें आपकी सभी पोस्टें पढी और पढ़कर ही कुछ कहा लेकिन आप मेरे बारे में मुझे बिना जाने कह रही हैं | अगर आपनें मेरी कविता " जब पुरुष नें कहा तो ...." पढ़ी होती तो शायद आप समझ जातीं की मैं कहना क्या चाहती हूँ | मुझे आपसे हृदय से हमदर्दी है | अगर आप पीड़ित हैं या आपके जीवन में किसी को भी लेकर कटु अनुभव रहे हैं तो अपनी पीड़ा बांटिए और यकीन जानिए हम आपकी पीड़ा सुनेंगे ही नहीं बल्कि आपका दर्द बांटेंगे भी | मैं ये भी समझ सकती हूँ की आपनें जो कहा वो कोइ नफरत की आग में जलता हुआ इंसान ही कह सकता है और नफरत भी यूं ही पैदा नहीं हो जाती उसके कुछ कारण होते हैं | क्या ये साबित करके की पुरुष एक जैसे होते हैं या नहीं या नारिया गुलामी पसंद करती हैं या नहीं ( जो असंभव है ) आपके अन्दर धधकती ज्वाला शांत हो जाएगी , शायद कभी नहीं | दुःख बांटने से कम होता है और मानसिक संतुष्टि भी मिलती है , सो हम फिर भी यही कहेंगे की आप दुखी हैं तो अपना दुःख बांटिए , विवाद खड़े करे अपनी पीड़ा को बढायें नहीं , इससे किसी को भी कुछ हासिल नहीं होगा | दो चार दिन बाद हर कोइ भूल जाएगा और आप लोगों की प्रतिक्रया पढ़-पढ़कर दुखी होती रहेंगी | वैसे भी साहित्य क्षेत्र में यही कहा जाता है की जो आपको बेबाक कह देता है वही एक लेखक का सच्चा मित्र होता है | आप शायद हमें अपना दोस्त न मानें लेकिन हम आपके दुश्मन नहीं हैं , जहां जो उचित लगता है कहते हैं और कहते रहेंगे | नारी आज़ादी की पक्षधर मैं भी हूं लेकिन शायद अभी आप मेरी बातें नहीं समझ पाएंगी | आपके लिए हमारी शुभ-कामनाएं |

के द्वारा: seema seema

सीमा जी आपके लेख को पढ़ा अच्छा लगा | क्योंकि आपने सीधे बात की है | शायद आप ये भी जानती होगी की आज इस ग्लैमर से भरी दुनिया में हर कोई अपना नाम सबसे ऊपर देखना चाहता है | और ये इंसान इतना गिर चूका है की इस ग्लैमर को पाने के लिए वो सब कुछ कर सकता है | यहाँ अनीता जी ने तो सिर्फ एक लेख ही लिखा है, मैं तो समझता हु की ये कोई ज्यादा बड़ी बात नहीं, लोग तो इस नाम के लिए, लोकप्रियता पाने के लिए, ग्लैमर पाने के लिए जाने क्या-क्या करने को राजी हो जाते है. और इस समाज में रचनात्मक परिवर्तन लाने के लिए हमें एक नया रास्ता इख्तियार करना होता है जिसके लिए हिम्मत और हौसला चाहिए. इस लेख (जवाब) में आपने बिलकुल सीधी-सीधी बात की है बिना कुछ छुपाये, ये हमें अच्छा लगा. इसके लिए आपको शुभकामनाये. www.bhagwanbabu.jagranjunction.com

के द्वारा:

के द्वारा: seema seema

चातक जी आपने समस्या का समाधान दे दिया लेकिन उसके परिणाम क्या होंगे , यह भी सोचने का विषय है एक पढी लिखी कमाऊ लडकी के लिए तलाक आजकल कोइ बड़ी बात नहीं है , बल्कि अलगाव का आपसी समझौता अगर समझदारी से होता है तो तनाव भरी जिन्दगी से मुक्ति मिल जाती है लेकिन हमारे देश में ऐसे लोगों की संख्या बहुत कम है | जहां की लगभग ७०% जनता गरीबी रेखा के नीचे और अनपढ़ता का जीवन जी रही है , वहां सोचने वाली बात है की क्या तलाक के बाद कोइ औरत सामान्य जीवन जी पाएगी या फिर उसे जीने दिया जाएगा | बहुत से प्रश्न मन में घूमने लगते हैं , हमारे पास इन सब प्रश्नों के जवाब तो होते हैं मगर हल कोइ नहीं मिलता | आपकी बहुमूल्य प्रतिक्रया के लिए धन्यवाद |

के द्वारा: seema seema

धन्यवाद खुराना जी , यही हमारे समाज की मानसिकता बदलने की आवश्यकता है | सोचा जाए तो भारतीय नारी जैसा महान शायद कोइ नहीं हो सकता जो अपने लिए नहीं बल्कि अपनों के लिए जीवन भर त्याग करती है |शायद यह एक ही कारण है की भारतीय पारिवारिक व्यवस्था दुनिया में मिसाल है |लेकिन जाब उसी औरत का तिरस्कार होता है तो वास्तव में वह इंसानियत के नाम पर लांछन है | जरूरत है सामाजिक जागरूकता की और नारी को सम्मान और अधिकार देने की | अगर ऐसा हो जाए तो हमारा समाज आदर्श समाज कहलाएगा | हम कुछ कर नहीं सकते , लेकिन उम्मीद तो कर ही सकते है ऐसे समाज की और कहते हैं न की उम्मीद पर ही दुनिया कायम है | आपकी बहुमूल्य टिप्पणी के लिए आभार |

के द्वारा: seema seema

आशु जी सर्वप्रथम तो आभारी हूँ की आपने कहानी को पढ़ा और बिना कहे उस तथ्य की ओर ध्यान दिलाया जिसे मैंने सोचने के लिए छोड़ दिया था , और ये भी सच है की अगर मैं ही उन तथ्यों को स्पष्ट करती तो कहानी कहानी न रहकर शायद भाषण बन जाती , फिर भी कुछ ऐसे प्रशन एक पाठक होने के नाते मेरे मन में उठते हैं यह कहानी पढ़कर ( जो आपनें नहीं उठाए ) यहाँ जरूर कहना चाहूंगी ( जो मैं कहानी में नहीं कह पाई ) १. क्या वास्तव में औरत ही औरत की दुश्मन है , पुरुष नहीं ? मेरे विचार से यह अपनी कमियों को छुपाने का अच्छा तरीका है कि औरत को ही औरत का दुश्मन कह दो ( डिवाईड एंड रूल ) | २. इस कहानी की पात्रा शारदा क्या एक औरत की दुश्मन है या हमदर्द , जिसनें औरत होकर औरत को निराशा में एक आशा की किरण दिखा दी ? शायद एक औरत ही ऐसा कर सकती है , फिर वह औरत की दुश्मन कैसे हुई ? ३. कहानी की नायिका जो मालकिन होकर( औरत होने के नाते ) किसी ऐसी औरत के आंसू जिसे वह जानती तक नहीं देखकर बेचैन हो जाती है , क्या वह औरत की दुश्मन है ? ४. वो औरत कविता जो जीवन से निराश हो चुकी है लेकिन एक माँ की ममता के हाथों मजबूर हो जाती है और जीवन में फिर एक उम्मीद के सहारे आगे बढ़ने लगती है ? क्या वह औरत की या किसी और की दुश्मन है ? ५. क्या वो कानून का रखवाला औरत का दुश्मन नहीं , जो लालच में अंधा हो गया ? ६. क्या वो मर्द कहलाने के काबिल भी है जिसने पत्नी पर हाथ उठाया , हमारी भारतीय सभ्यता / संस्कार तो ऐसे नहीं हैं कि एक पति अपनी पत्नी की कमाई पर ऐश करे ? क्या गलती उस औरत की जो दिन भर काम करती है , घर संभालती है , बच्चे की देखरेख करती है , फिर भी उसे बदले में मिलता क्या है , क्या इंसान होकर इतनी भी इंसानियत एक पुरुष में नहीं होती ?( सब एक जैसे नहीं होते , लेकिन इस सच्चाई को भी झुठलाया तो नहीं जा सकता | ७. वो बिरादरी जहां कविता नें अपना रोना रोया , क्या वो औरत की दुश्मन नहीं जिसने एक और पर ही थू-थू किया ? अब प्रश्न उठता है कि औरत औरत की दुश्मन कैसे ? तो सच्चाई यह है कि एक पुरुष के लिए ही औरत औरत की दुश्मन बन जाती है ? एक बेटे की माँ अक्सर अपने बेटे की खातिर ही बहु की विरोधी होती है तो वही माँ अपनी बेटी की हमदर्द होती है ( वो बेटी जो एक औरत है ) तो यहाँ मैं कहूंगी कि एक औरत एक बेटे की माँ होकर दूसरी औरत की दुश्मन हो जाती है न कि हर औरत हर औरत की दुश्मन होती है | अब रही गलतियों की बात तो कोशिश करूंगी कि आगे से आपको कम से कम इसमें निराश न होना पड़े | धन्यवाद |

के द्वारा: seema seema

सीमा जी, विषय अच्छा चुना है आपने| लेकिन इस कहानी का जो वास्तविक तथ्य है वो अलग है यहाँ समस्या न बिरादरी की है न औरत की ज्यादा कमाई की| एक छोटी सी समस्या है दोनों के आपस में तालमेल न होने की ऐसे में दोनों के बीच अगर अलगाव (तलाक) हो जाए तो समस्या का हल मिल जाता है| महिलाओं को सिर्फ इतनी जागरूकता की आवश्यकता है कि तलाक के बाद भी जीवन है अकेले के दम पर जीने का माद्दा ही समस्या का हल है, पुरुष वर्ग या समाज को अपनी पीड़ा के लिए आरोपित कर देना नहीं| अगर किसी कारण तलाक नहीं मिल रहा तो 'judicial separation' एक बेहतर विकल्प के रूप में मौजूद है| लेकिन इस बात के लिए पुरुष और औरत के बीच दरार उत्पन्न करना पूरे समाज के लिए घातक हो सकता है जो किसी भी कीमत पर उपुक्त नहीं है| समाज में आज पतियों से संतुष्ट पत्नियों की संख्या असंतुष्ट पत्नियों की संख्या से कहीं अधिक है| जरूरत सिर्फ संतुष्टि को बढाने की है जहाँ तक हो सके पति-पत्नी को आपस में जोड़ कर और जब कोई दूसरा विकल्प न हो तो उनमे अलगाव करके|

के द्वारा: chaatak chaatak

सीमा जी... औरत औरत की दुश्मन नहीं है ... ये सच है .. पर सच मानिये वास्तव मे औरत अपनी दुश्मन खुद ही है ... और उसके भीतर का दुश्मन है उसका भावुक मन........ कोई निर्णय लेते वक़्त वोह इतनी कमजोर पड़ जाती है की जुल्म को सहना उसे आसान लगने लगता है ... वोह अपने लिए बहुत सारी जिंदगियों को दावं पर नहीं लगा पाती... कितनी भी पढ़ी लिखी, ऊचे पद पर काम करने वाली औरत हमेश अपनी निजी जिन्दगी में कुछ न कुछ सहती है... शायद यही उसकी नियति है .. भगवन ने उसे भावुक मन देकर अच्छा किया है या बुरा ये तो एक औरत ही जानती है .... पर मुझे हर औरत पर नाज़ है चाहे वोह जैसी भी है ...... चाहे जुल्म को सहती या जुलम के खिलाफ आवाज उठाती है ... मेरी और हर औरत को सलाम............

के द्वारा: roshni roshni

शिवेंद्र मोहन सिंह जी मेरे ब्लॉग पर आपका स्वागत है | किसी अहम् विषय पर अपने विचार व्यक्त करना या मुद्दा उठाना बहस कहलाता है लड़ाई नहीं और आपने सही कहा की व्याकरण आचार्य तो यहाँ कोइ भी नहीं , इंसान हैं तो गलती होना स्वाभाविक है , हाँ आगे से हम उसे सुधारने की कोशिश अवश्य कर सकते हैं | रही अखबार में नौकरी की बात तो उस विषय में अभी तक न हमने जरूरत महसूस की और न ही कभी सोचा लेकिन आपका विचार बुरा नहीं है | ये तो अब जागरण वालों से कहना पडेगा कि इतनी नौकरियाँ निकालो कि सबको रोज़गार मिल जाए | यह एक जाग्रति का मंच है -विचारों की जाग्रति का | हमें आज़ादी है अपने विचार प्रकट करने की और आप अगर दूसरों के विचारों से सहमत नहीं या दुसरे आपके विचारों से सहमत नहीं तो अपनी भड़ास निकालने का भी हक़ हम सबका है | जहां उस हक़ का हनन होगा आवाज़ तो उठेगी ही | आपसे भी गुजारिश है कि आप भी इस सबका हिस्सा बन अपना योगदान दें | आपकी बहुमूल्य प्रतिक्रया के लिए आभार |

के द्वारा: seema seema

आशु जी हमारे ब्लॉग पर आपका स्वागत है | मुझे आपकी किसी भी बात का बुरा नहीं लगा और न ही कभी लग सकता है | हमने कुछ लिखा और पाठकों के सम्मुख रख दिया तो सबको उस पर अपनी राय देने का अधिकार है | मैंने बिना पढ़े इसलिए कहा था क्योकि हमने पहले ही स्पष्ट कर दिया था इ हमनें किसी चैलेन्ज को नहीं स्वीकारा है और न ही हम टॉप टेन ब्लोगर में से है कि इसको अपनी मान-मर्यादा का सवाल मान कर लिखें और न ही सनी राजन जी नें हमें कोइ चैलेन्ज दिया था , फिर भी आपनें उसे एक चैलेन्ज के साथ जोड़ा | मैं अब भी यही कहूंगी कि आपनें लेख पूरा पढ़ा होता तो आप किसी से मुकाबला नहीं करते और भाषा का प्रश्न भी नहीं उठाते | हमें अधिकार है अपनी बात कहने/ लिखने का और हम कहेंगे , जिस भाषा में हम सहज समझेंगे | जहां तक हिन्दी लिखने में गलतियों का सवाल है वो मैंने अपने पिछले लेख में भी आपकी प्रतिक्रया के जवाब में माना कि ये नहीं होनी चाहिएं , उसके लिए हम सुधार का प्रयास करेंगे | ये तो आप भी समझ सकते हैं कि इंग्लिश टाप्यिंग जितनी आसान है हिन्दी टायपिंग उती ही कठिन है तो गलतियां होना स्वाभाविक भी है | आप अपनी ही टिप्पणी पढ़कर देखिये , आपको अपनी गलतियाँ दिखाई देंगी | फिर भी हमारा आगे से प्रयास रहेगा कि इसमें सुधार हो | आपका मानना है कि टोपिक इंग्लिश में था तो इंग्लिश में ही लिखना चाहिए था तो ये तो जिन्होंने यह चैलेन्ज दिया था , वही बता सकते हैं कि उस टोपिक पर लिखने के लिए उन्होंने ऐसी कोइ विशेष शर्त राखी थी या नहीं | वैसे ऐसी शर की संभावना भी नहीं लगती क्योंकि वे खुद हिन्दी में भी लिखते हैं और उन्होंने मेरा गुलाबी रंग पर लेख न केवल पढ़ा बल्कि सराहना भी की केवल मेरे ब्लॉग पर आकर ही नहीं अपने ब्लॉग में भी , तो मुझे नहीं लगता कि उन्हें हिन्दी में लिखे जाने पर कोइ एतराज़ था , तो आपको भी नहीं होना चाहिए | बात विचारणीय थी कि क्या हमें अपनी भाषा में बात कहने का हक़ नहीं , इसलिए मुझे यह लेख लिखना पडा | आभार |

के द्वारा: seema seema

तुस्सी बिलकुल सही किहा खुराना जी , अपणी भाषा अपणी ही हुन्दी है | रही उस चैलेन्ज की बात तो मैंने पहले ही कहा था की बस मन किया लिखने को , क्योंकि विषय अच्छा था तो लिख दिया , किसी को आहत करने या नीचा दिखाना हमारा अभिप्राय नहीं था और न ही कभी हो सकता है | मैं बस इतना कहना चाहती हूँ कि हम सब को अपनी भावनाएं व्यक्त करने की आज़ादी है , वो भी अपनी सुविधानुसार , जिस भी भाषा में सहज महसूस करें | अगर कल को मुझे लगेगा कि मैं कोइ बात हिन्दी में अच्छे से नहीं कह पा रही हूँ तो मैं पंजाबी / अंगरेजी में भी लिख सकती हूँ | सबसे बड़ी बात कि हम भारतीय हैं और हमें अपनी भाषा पर गर्व है | आपकी बहुमूल्य प्रतिक्रया के लिए धन्यवाद |

के द्वारा: seema seema

धन्यवाद सुमित जी , हमारा अभिप्राय किसी भी भाषा से कोइ विरोध नहीं , हर भाषा अपने आप में सम्पूर्ण होती है तभी तो माँ का दर्जा पाती है | हमें अपनी भावाभिव्यक्ति का हक़ है , भाषा चाहे जो भी हो , भावनाएं तो सबकी होती हैं | जब हम अपनी भाषा में सहज अहसूस करते हैं तो क्यों न अपनी भाषा में लिखें | दक्षिण भारत में हम हिन्दी को अंगरेजी माध्यम से पढ़ाते हैं क्योंकि यहाँ बच्चों के लिए इस तरह ही सीखना आसान है | लेकिन वास्तविकता में उसका क्या जब आप अपनी पूरी बात ही न कह पाओ और आपको बोलते समय कहीं अपनापन ही न लगे | मैं समझती हूँ वो खुद को सजा देने के सामान है | रही मुद्दों की बात तो मुझे लग भी रहा था कि कोइ न कोइ अवश्य यह मुझसे कहेगा | विषय विचारणीय था , इस लिए लिखा गया | आप तो जानते हैं हम कोइ जान-बूझ कर तो लिखते नहीं , पर कलम है कि रुकती नहीं | आपकी बहुमूल्य टिप्पणी के लिए धन्यवाद |

के द्वारा: seema seema

प्रिय सीमा जी, तुस्सी ठीक आख्या ऐ ! ऐद्दां किद्दां हो सकदा है के अस्सी अपनी भाषा विच गल वी नहीं कर सकदे ! क्षमा कीजियेगा मुझे भी अपनी MATR भाषा पंजाबी में लिखने का मन कर आया ! एक बात कहना चाहता हूँ की हम आँख वाले अलग अलग भाषा का प्रयोग करते हैं लेकिन नेत्रहीन केवल एक ही भाषा ब्रेल लिपि में सब कुछ लिख लेते हैं ! उनकी एक ही लिपि है ! सीमा जी, लिखना जरूर चाहिए ! इस मंच की यही तो खासियत है की इस मंच में हर किसी को अपनी बात कहने का पूरा मौका दिया जाता है ! हर कोइ पहले से ही सब कुछ सीख कर नहीं आता ! इसी प्रकार सीख जाता है ! करत करत अभ्यास के........! रही बात चैलेन्ज की तो मैं एक बार फिर बता दूं की इस चैलेन्ग को किसी ने भी गंभीरता से नहीं लिया था ! आपने फिर भी बहुत अच्छा प्रयास किया ! मेरी तरफ से साधुवाद ! मुझे तो बहुत अच्छा लगा ! राम कृष्ण खुराना

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के द्वारा: seema seema

पंगेबाज जी हिन्दी या हिन्दी साहित्य को बिगाड़ने वाले आप जैसे लोगों की कमी नहीं है | आप अकेले इस क्षेत्र में नहीं जुटे हैं | जहां तक हिन्दी को बिगाड़ने की बात है तो अहिन्दी भाषी प्रदेशों में ऐसा होता है जहां हिन्दी को अंगरेजी अनुवाद करके पढ़ाया जाता है | भले ही उन राज्यों की भाषा हिन्दी नहीं है लेकिन हिन्दी को सीखने की ललक इस कदर है कि वे लोग किसी भी तरह हिन्दी सीखना चाहते है | खैर ये सब बातें हमारा विषय नहीं है | रही बात कबीर रहीम को याद करने की तो आज भी हर कक्षा में कबीर रहीम तुलसी जैसे कवियों के साहित्य को प्रथम स्थान दिया जाता है और ९९% विद्यार्थी इसे रूचि लेकर पढ़ते हैं | आपको अगर याद नहीं तो इसका मतलब ये तो नहीं कि ऐसे महान साहित्य की कोइ कद्र ही नहीं रही | आपने इन महान लेखको को याद किया और अर्थ का अनर्थ कर दिया | आप खुद मानते हैं कि आपने शब्दों का हेर फेर किया ...पर क्यों ? यही बात हम आपसे जानना चाहते हैं | अगर आपनें इन दोहों के आधार पर व्यंग्य ही करना था तो अपने दोहे गढ़ते , अपनी शब्द रचना करते और अपने नाम का प्रयोग करते हुए उसे पब्लिश करते तो आपकी कलात्मकता की सराहना हम भी शायद करने आते | मुझे ऐसी कोइ रचनाएं पढ़ने में रूचि नहीं है और न ही ऐसा बेहूदापन पढ़ कर अपना समय बर्बाद करना चाहती हूं | आपके ब्लॉग के कारण किसी के साथ क्या हुआ ये मैं नहीं जानना चाहती और न ही मैं किसी रवीश जी को जानती हूँ | मैं बस इतना जानती हूँ कि महान रचनाओं के साथ आपने जो खिलवाड़ किया वो मुझे क्या किसी भी साहित्य प्रेमी को बुरा लगेगा | अगर आपमें वास्तव में रचनात्मकता है तो अपना कुछ मौलिक कीजिए | दुसरे के कंधे पर बन्दूक रखकर निशाना साधने से आप निशाने बाज़ नहीं हो जाते , हाँ थोथी लोकप्रियता आपको अवश्य मिल जाएगी , जिसके पीछे आप जैसे लोग भागते हैं | इस सबमें आपकी एक अच्छाई भी पता चली कि आपमें इंसानियत नाम की चीज है और किसी की भावनाओं की कद्र करना आप जानते हैं | आशा है आपकी कलम से कुछ सकारात्मक निकलकर आएगा और आपकी प्रतिभा के सम्मुख नत-मस्तक होंगे | धन्यवाद |

के द्वारा: seema seema

के द्वारा: seema seema

सीमा जी माफ़ी चाहूँगा . जरा हिंदी के अखबार पढ़िए . आपको हिंदी के सामान्य शब्दों की जगह अग्रेजी के शब्द मिलेंगे . माल संसकृति का नाम लेकर मीडिया हिंदी की दुर्गति करने में लगा है . किसे याद आ रहा है कबीर रहीम रसखान ? कौन जानना चाहता है भारतेन्दू को ? प्रेमचंद की कितनी किताबे बिकती है ? सिर्फ हिंदी के लेखक अब पाठ्यक्रम में पढ़ने लायक रह गए है ? छंद सोरठा चौपाई तो अब नाम तक नहीं जानते लोग ? मुक्त का ज़माना है . अगर ऐसे में मैने हिंदी के महान साहित्यकारों को इस तरह याद कर लिया और आप सब को याद दिला दिया तो आपको इतना नाराज नहीं होना चाहिए . मैंने कोई फ़िल्मी तर्ज पर चोरी नहीं की, सिर्फ कुछ शब्दों की हेर फेर से उन्हें तातकालिक सन्दर्भ में ढाला है, ऐसे हमारे बड़े बड़े नाम भी कई बार ऐसा कर चुके है आप चाहेगी तो मै आपको उनके द्वारा की गई ऐसी प्रकार की रचनाये यही दिखा सकता हू . अगर अब भी आपका दिल मेरे कारण दुखा तो माफ़ी चाहुंगा अपना इरादा किसी का दिल दिखाने का कतई नहीं होता . रही बात रचनात्मकता की तो एन डी टी वी के रवीश से पूछ लीजिएगा . जिन्हे मेरे ब्लॉग के कारण दिन का प्रसारण रोक कर बैक फुट पर आना पडा था .

के द्वारा: pangebaj pangebaj

के द्वारा: seema seema

के द्वारा: seema seema

के द्वारा: seema seema

के द्वारा: seema seema

सीमा जी बहुत  ही सामायिक विषय आपने उठाया है … हमारे कुछ अत्याधुनिक लेखको की प्रवृत्ति रिमिक्स रिवाज से प्रभावित हो गई है जो उन्ही पुँराने मधुर गीतों को उठाते है जो प्रसिध है और उनमे मौलिकता के नाम पर नंगे होकर नाचते है ..और खुद को कलाकार बताते है… ऐसे ही कुछ लेखक है जो अपनी ही सभ्यता संस्कृति ..और उसके मान बिन्दुओ पर निर्लज्जता से प्रहार करते है उनपर घटिया व्यंग्य लिखकर अपने आपको महान लेखक सिद्ध करने का प्रयास करते है …. दुर्भाग्य ये है की हम ऐसे व्यक्तियों पर ऐसे मानको पर बेहयाई से लिख देते है जिनके पाँव की धूल भी नहीं हो सकते ….ऐसे लोगो की तीव्र निंदा होनी चाहिए …उन्हें बढ़ावा देना अपने पैरो पर कुल्हाड़ी मारने जैसा है

के द्वारा: NIKHIL PANDEY NIKHIL PANDEY

के द्वारा: NIKHIL PANDEY NIKHIL PANDEY

हिन्दुस्तान भेडिया धसान तो सुना ही होगा आपने| अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का सही इस्तेमाल शायद यही लोग कर रहे हैं| जिस देश में राजनेताओं से लेकर न्यायाधीशों तक में नंगई की होड़ लगी हो वहां छुटभैय्ये विचारक (जिसमे एक मैं भी हूँ) पीछे कैसे हट जाएँ| यहाँ कोई अच्छी बात कहने पर कोई नोटिस करता नहीं इसलिए कुछ ऐसा कहो जो बुरा हो| अब इससे ज्यादा मजेदार क्या होगा कि जिस व्यक्ति को आज़ादी का मतलब नहीं पता वो गांधी जी की खामियों पर प्रकाश डालता है, जिसे काव्य का अंदाजा नहीं वो रहीम और कबीर के दोहों का तिया-पाँचा करता है| आप भी दुखी ना हों श्रद्धेय अदम जी की कविता की पंक्तियाँ गौर फरमाइए- "जिस्म क्या है रूह तक सब कुछ ख़ुलासा देखिये आप भी इस भीड़ में घुस कर तमाशा देखिये जल रहा है देश यह बहला रही है क़ौम को किस तरह अश्लील है कविता की भाषा देखिये|"

के द्वारा: chaatak chaatak

सीमा जी आपने बहुत अच्छी कहानी लिखी है ............. मानवीय संबंधों और परिस्थितियों के साथ बदलते जीवन का जीवंत वर्णन किया है आपने, और साथ ही साथ ओनर किलिंग पर कुठाराघात भी किया है ............. यधपि मुझे इस विषय में कोई ज्ञान नहीं है, फिर भी इतना कहना चाहूँगा की, ओनर किलिंग एक अपराध है, मूल्यों और प्रतिमानों की हत्या है, लेकिन बढ़ाते हुए प्रेम-प्रसंगों और उनकी वज़ह से गिरते हुए नैतिक मूल्य भी स्थिति में हैं, हालाँकि मेरे पास कोई आंकड़ा नहीं है, फिर मैं इतना बताना चाहूँगा की आज जिस दर से प्रेम-संबंधों की वृद्धि हुई है, उसके २- १० गुना तक उनके टूटने, तलाकों, फरेबों में वृद्धि हुयी है | जिसकी वज़ह से समाज में निराशावाद और वैश्यावृत्ति जैसे बुराइयों के फलने फूलने ली पृष्ठभूमि बनाने लगी है .................................... ऐसा नहीं की मैं ओनर किलिंग का समरथन कर रहा, परन्तु इतना जरूर कहूँगा की समाज व्यवस्था एक जटिल निकाय है, जिसके तंत्रों से खिलवाड़ करना गंभीर और दूरगामी दुष्परिणामों का कारण बन सकता है ............................. और अंत में यही कहना चाहूँगा की बन्दूक रक्षा के लिए प्रयोग की जाए तो जीवन बचाती है, और निशाना अपनी खोपड़ी पर साथ जाय तो परिदान सब जानते हैं ......................

के द्वारा: Shailesh Kumar Pandey Shailesh Kumar Pandey

वादा, क्या है है ये वादा, एक झूठ, या थोडा सच, एक फरेब, या बातें बस, या फिर एक पन्ना सादा? वादा, क्या है ये वादा? ये तो आपके इस लेख के ऊपर हमारी प्रतिक्रिया है. साथ ही ये भी कहना चाहूँगा की गुरु द्रोण ने एकलव्य के साथ जो किया वो गलत था, है और हमेशा रहेगा. अब आपने प्रश्न किया की महाभारत के प्रसंगों मैं जब इतनी विसंगतियां हैं तो बच्चों का मार्गदर्शन कैसे हो? इसके निवारण हेतु मैं महाभारत का एक प्रसंग लिखने जा रहा हूँ. अब आप तो जानती ही हैं की हर सिक्के के दो पहलु होते हैं, उसी तरह महाभारत में अगर अत्याचार और छ्हल के प्रसंग हैं तो बहुत ऐसे भी प्रसंग हैं जो बच्चों का मार्गदर्शन कर सके. ऐसे ही एक प्रसंग को में यहाँ लिख रहा हूँ. गुरु द्रोण से एक बार दुर्योधन ने प्रश्न किया. गुरुदेब, हम सभी में कोई न कोई गुण है, हम सभी मेहनत करते हैं, आपकी आगया का पालन करते हैं लेकिन आप हमेशा अर्जुन को ही अपना सबसे अच्छा शिष्य बताते हैं, ऐसा क्यूँ? इस बात पर गुरु द्रोण ने दुर्योधन से धीरज धरने को कहा और समय आने पर इस प्रश्न के उत्तर को बताने की बात कही. अर्धरात्रि थी, सभी सोये हुए थे. अचानक से गुरु द्रोण दुर्योधन के कमरे में प्रविष्ट हुए और उन्होंने उसे जागते हुए कहा " शिष्य आज समय आ गया है की में तुम्हें तुम्हारे प्रश्न का उत्तर दूँ." इतना कह कर वो दुर्योधन को लेकर आश्रम से बाहर जंगल की तरफ गए. वहां पहुँच कर उन्होंने दुर्योधन से पूछा शिष्य क्या तुम कुछ सुन प् रहे हो? दुर्योधन ने कहा हाँ. थोडा और आगे जाने पर उन्होंने उससे पूछा. शिष्य क्या तुम कुछ देख पा रहे हो? दुर्योधन ने कहा- हाँ एक मनुष्य धनुष बाण लेकर अभ्यास कर रहा है. थोडा और आगे जाकर जब उन्होंने दुर्योधन से अभ्यास करने वाले व्यक्ति को पहचानने को कहा तो दुर्योधन अर्जुन को देख हतप्रभ हो गया. तब गुरु द्रोण ने कहा- दुर्योधन, में अर्जुन से आश्रम के सारे काम करवाता हूँ. वो मेरी हर आज्ञा का पालन करता है. साथ ही आश्रम के सारे काम करता है. दिन में समय न मिलने के कारन रात्रि में अब्यास करता है. इतने मेहनत के बाद भी कभी उफ़ नहीं करता. क्या अभी भी तुम्हें लगता है की अर्जुन मेरा सबसे अच्छा शिष्य नहीं है? ऐसे और भी कई प्रसंग हैं महाभारत और रामायण में, अगर कुछ प्रसंग हमारे मन में प्रश्न पैदा करते हैं तो कुछ हमें आगे अच्छा करने को प्रोत्साहित करते हैं. आप वैसे प्रसंगों का चुनाव करें जो बच्चों का मार्गदर्शन करें. ऐसे कई प्रसंग हैं हमारे प्राचीन साहित्य में. अब मेरी अपनी बात. आपकी प्रतिक्रिया मिली, मेरे उपन्यास पर. में बस इतना पूछना चाहता हूँ की क्या अब तक सबकुछ ठीक है, आगे से तो में आपके सुझावानुसार कार्य तो करूँगा ही. आभार, निखिल झा

के द्वारा: Nikhil Nikhil

मनीषा जी आपकी प्रतिक्रया पढ़कर तो खून उबलने लगता है | अगर लडकी ही इतनी कमजोर न हो तो शायद हमारे समाज में बलात्कार जैसी घिनौनी घटनाओं काफी हद तक ख़त्म किया जा सकता है | अब आपने इतनी बड़ी बात कह दी वो भी हमारी कहानी की कसम खाकर तो हम कहेंगे भले ही हमारी कहानी मिट जाए पर आप मुहब्बत न करने की गलती मत कीजिए | एक साहित्यकार साहित्य के माध्यम से वही दिखाने का प्रयास करता है जो नज़रों से ओझल होता है या फिर वो सच्चाई सामने लाने का प्रयास होता है जिसे समाज से छुपाने का प्रयास किया जाता है | उसका एक दूसरा पहलू भी होता है तो मई चाहूंगी की आप तस्वीर के दूसरे रुख को देखें | मई आपकी बातों से पूरी तरह सहमत हूँ लेकिन अगर ऐसी कहानी पढ़कर किसी के भी मन में नकारात्मक विचार पनपने लगें तो हमें भी अपनी कहानी की कसम आगे से लिखना छोड़ देंगे |

के द्वारा: seema seema

के द्वारा: seema seema

के द्वारा: seema seema

के द्वारा: seema seema

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चातक जी, न जाने क्यों किन्तु मेरा मन इस विषय पर आपसे बिलकुल सहमत नहीं हैं, यधपि मुझे तीरंदाजी की बारीकियां नहीं मालूम, किन्तु यदि गुरु द्रोण एकलव्य को त्रुटिहीन तीरंदाज़ बनाने के लिए इतना बड़ा कलंक अपने सर ले बैठे, तो अपने प्रिय शिष्य अर्जुन जिनको की उन्होंने दुनिया का सर्वश्रेस्त्र धनुर्धर बनाने की शपथ ली थी, उनका अंगूठा क्यों नहीं मांग लिया, क्योंकि लक्ष्य साधते वक्त तो अर्जुन का अंगूठा भी करता होगा, जो एकलव्य का करता था ! मुझे लगता है, यहाँ गुरु द्रोण ने स्वार्थ से कार्य लिया, और अपना वचन निभाने के लिए एक प्रतिभाशाली को बलि चढ़ा दिया ! हमारे शाश्त्र ये कहते हैं, हाँ मगर मुझे लगता है कुछ इतिहास के खलनायकों को नायक बनाने और उनकी गलतियों को छिपाने के लिए, बाद मैं ऐसा शाश्त्र लिखे गए !

के द्वारा: allrounder allrounder

सर्वप्रथम तो एक अच्छा ब्लॉग लिखने के लिए बधाई. जहाँ तक एकलव्य प्रसंग का सवाल है तो मेरा मानना है कि शुभम के बहाने आपने एक अच्छा प्रसंग छेड़ दिया है. द्रोण-एकलव्य प्रसंग भारत की महान गुरु-शिष्य परम्परा का प्रतीक माना जाता है. मगर माफ़ करना एकलव्य का अंगूठा मांगकर द्रोण ने गुरु के कर्तव्य का ठीक ढंग से निर्वहन नहीं किया. एकलव्य अर्जुन से श्रेष्ठ धनुर्धर था. ऐसे में गुरु द्रोण ने अपने प्रिय शिष्य अर्जुन को धनुर्विद्या में चुनौती देने वाले एकलव्य का अंगूठा मांग लिया, ताकि श्रेष्ठ धनुर्धर का तमगा अर्जुन के पास ही रहे. यानी...न रहेगा बांस न बजेगी बांसुरी. चातक जी ने सही कहा है की द्रोण एक योग्य एवं मेधावी गुरु थे. लेकिन एकलव्य के मामले में द्रोण असुरक्षा की भावना से ग्रसित हो गये. उन्हें लगा कि उनका प्रिय अर्जुन एकलव्य की तुलना में कहीं कमतर साबित न हो जाए, इसलिए उन्होंने एक उभरते हुए तीरंदाज़ एकलव्य का करियर ही चौपट कर डाला. हमें याद है की स्कूल में हमारे संस्कृत के शिक्षक अपने कुछ मुंहलगे छात्रों को ही भाषण, निबंध प्रतियोगिता के लिए तैयार करते थे. क्लास के अन्य एकलव्यों की और उनका ध्यान ही नहीं गया. ठीक ऐसी ही मानसिकता द्रोण ने अपनाई. ज्ञानीजन मुझे माफ़ करें...गुरु द्रोण बेशक एक महान गुरु थे, श्रेष्ठ धनुर्धर थे. उनकी महानता को सलाम....लेकिन मेरी नजर में उन्होंने एकलव्य के साथ भेदभाव का नजरिया अपनाया. जो उन्हें नहीं करना चाहिए था. रहा प्रश्न एकलव्य का... तो उन्होंने गुरु की एक मांग पर अपना अंगूठा काट दिया... ये उनकी गुरु के प्रति श्रद्धा व समर्पण का भाव दर्शाता है.

के द्वारा: parveensharma parveensharma

आलराउंडर जी, द्रोणाचार्य जैसा गुरु ही अर्जुन और एकलव्य पैदा कर सकता है | मैं आपका विरोध नहीं कर रहा बल्कि एक गुजारिश है कि इसी ब्लॉग पर मेरे कमेन्ट को पढ़ें और मुझे भी राय दे | क्या मैं गलत हूँ या वे जो बिना तथ्य की गहराई तक गए निष्कर्ष निकालते हैं | हमारी जिम्मेदारी है अपने बच्चों को सर्वोत्तम देने की लेकिन क्या हम स्वयं सर्वोत्तम ज्ञान रखते हैं ? क्या निर्णय लेने की हमारी क्षमता उन लोगों से बेहतर है जिनकी कहानियाँ हमारी पौराणिक पुस्तकों में है ? क्या हम उन पौराणिक पात्रों का अंश मात्र भी साहस, मेधा, कर्त्तव्य परायणता, निष्ठा या ज्ञान रखते हैं | हम प्राचीन कथाओं को दरकिनार तो कर दें लेकिन क्या उनकी स्थानापन्न कहानिया हमारे आधुनिक एवं तथाकथित सफल लोगों में मिलती हैं ?

के द्वारा: chaatak chaatak

सीमा जी, आप से पहली गुजारिश है कि मेरे कमेन्ट (जो सिर्फ आपकी समस्या को सुलझाने का एक प्रयास मात्र है) को सारे पूर्वाग्रह से मुक्त होकर पढियेगा | मैंने आपके ब्लॉग को शब्दशः पढ़ा वैसे मैं किसी भी ब्लॉग को (जिस पर टिप्पड़ी देनी हो) गौर से पढता हूँ | आपकी समस्या बहुत ही छोटी है | बालमन जिज्ञासु होता है और वह अपनी जिज्ञासा को तृप्त करके ही मानता है | आप बच्चे को बड़ी और महान नैतिक कथाओं का सार भी नहीं समझा सकते (माफ़ कीजियेगा हममे से ज्यादातर खुद ही नहीं समझते या गलत तरीके से समझते हैं ) इसका मतलब ये नहीं कि आप बच्चे को पौराणिक और नैतिक कथाओं से वंचित रखें | अगर आप पहले खुद उस कथा का नैतिक ज्ञान समझ ले तो ये काम बहुत ही आसान है | मैं आपकी कहानी का ही उदाहरण लेता हूँ- आप स्वयं द्रोणाचार्य एवं एकलव्य की कथा से सहमत नहीं थी इसीलिए आप इस कहानी पर उठे प्रश्नों का सामना नहीं कर पायीं और घबरा कर आपने लिखा- \\"क्या ऐसी कहानियां हमें आजकल के बच्चों को नहीं सुनानी चाहिएं । क्या मैने गलती की बच्चे को एकलव्य की कहानी सुनाकर । केवल एकलव्य की ही नहीं कितनी ऐसी कहानियां है जिससे नकारात्मक विचार पनपते हैं और आज के आधुनिक युग के बच्चे जब बडों से भी बढकर बडी बातें सोचते हैं तो क्या हमारी शिक्षा प्रणाली में उसी हिसाब से बदलाव नहीं होने चाहिएं । एक अहं प्रश्न क्या एक गुरु का अपने अनजान शिष्य से अंगूठा मांगना उचित था ? और क्या एकलव्य का यूं बिना सोचे-समझे अंगूठा काट कर दे देना क्या उचित था ?\\" जबकि इस कहानी का नैतिक ज्ञान बड़ा ही रोचक है मैं बताता हूँ - गुरु द्रोणाचार्य निःसंदेह एक योग्य एवं मेधावी गुरु थे | जब उन्होंने एकलव्य की परीक्षा ली तो उन्होंने देखा कि वह अंगूठे और तर्जनी से पकड़ कर तीर से वह निशाना लगा रहा है जो उनका सबसे मधावी शिष्य अर्जुन भी नहीं लगा पाता था | उन्हें आश्चर्य हुआ कि एक आदिवासी किशोर राजपुत्रों से कहीं अधिक कुशलतापूर्वक शस्त्र प्रचालन कर सकता है | अपने वचन में बंधे गुरु के पास एकलव्य को खाली हाथ भेजते भी लज्जित अनुभव कर रहे थे | अतैव बालक को सम्पूर्ण कुशलता प्रदान करने का आखिरी मंत्र उन्होंने उससे अंगूठा मांग कर दिया | शायद आपको आपको तीरंदाजी का मूल मंत्र नहीं पता है | तीर सटीक निशाना तब लगाता है जब तीर मध्यमा एवं तर्जनी के मध्य पोरों के बीच दबा कर खींचा जाये और उस पर अंगुष्ठ का बल आरोपित न हो | चूँकि गुरु द्रोणाचार्य अर्जुन को ही सर्वोत्तम धनुर्विद्या देने का वचन दे चुके थे अतः एकलव्य को बिना सिखाये त्रुटिहीन बनाने का सिर्फ एक ही रास्ता था कि उसका अंगूठा काट दिया जाए | हलाकि इसके लिए उन्हें एक ऐसा कलंक अपने सर लेना पड़ा जो रहती दुनिया तक उनके माथे लगा रहेगा | और इतना बड़ा त्याग शायद एक गुरु ही कर सकता था या कर सकता है | अब तक बात आपकी समझ में आ गयी होगी और आपको बच्चे को सही मोरल समझाने में भी दिक्कत नहीं आएगी | देखा आपने चीज़ें किंतनी आसान हैं | हम अपनी अज्ञानतावश उन्हें जटिल बनाते हैं | अगर आपको इससे ज्यादा कुछ समझना हो तो आप मुझे krishnotcrisp@gmail.com पर मेल भेज दें द्रोणाचार्य और एकलव्य के संबंधों प्रयोग द्वारा सत्यापन मैं आपको बता दूंगा आप अपने बच्चे के साथ कर के देखें मज़ा आ जायेगा | फिलहाल इतना ही | जवाब पढने के लिए धन्यवाद !

के द्वारा: chaatak chaatak

सीमाजी आपके इस लेख को तो मैंने पहले ही पढ़ लिया था, लेकिन फिर अपने लेख को लिखने मैं व्यस्त हो गया. सोचा तसल्ली से आपके लेख का विवरण करूँगा. आपने जिस तरह से इस लेख को शुरू तो किया अपने शुबह्म से और फिर एकलव्य के प्रश्न पर ख़तम किया, उसने कई प्रश्न कहदे किये हैं. साथ-साथ आपने बिना पढ़े प्रतिक्रिया देने वालों पर तीखा कटाक्ष किया जो मुझे बहुत पसंद आया. जहाँ तक रही बच्चों की बात तो आपका कहना बिलकुल सही है है, आज के बच्चों की सोच हमारे खुद के बचपन की सोच से कहीं ज्यादा है. लेकिन एकलव्य की कहानी या ऐसे ही किसी कहानी को सुनाने मैं कोई बुरे नहीं, उन्हें उस कहानी मैं क्या अच्छा है और क्या बुरा ये तो हम समझा ही सकते हैं.

के द्वारा: Nikhil Nikhil

के द्वारा: seema seema

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आप सभी के हम बहुत ही शुक्रगुजार हैं, जिन्होंने हमारी परेशानी को अपनी परेशानी समझ कर साथ दिया और तब तक लड़ते रहे, जब तक कि बुराई हार ना जाये… तो देखिये हम सब की एकता की ताकत के आगे बुराई आखिर हार ही गई, अरे भाई उस चोर ने अपने ब्लॉग से इस मंच की रचनाएँ हटा ली है…तो अब हम खुश हैं और आप सभी भी हो जाइये….. इस मंच पर यहीं तो बात अच्छी लगती है कि एक प्रतियोगिता में भाग लेते समय लोग वैसे तो एक दुसरे के प्रतिद्वंदी बन जाते हैं, पर जरुरत में हर कोई साथ होता है….और किसी एक का दुःख सबका होता है….ये मंच एक परिवार ही है….और भगवान से प्रार्थना है कि सभी के बीच ये स्नेह हमेशा बनाये रखे… पर हम सभी को अभी कुछ काम और करने होंगे….हमें इस समस्या का ठोस उपाय सोचना पड़ेगा ताकि भविष्य में इसकी पुनरावृत्ति ना हो और ये जड़ से ख़त्म हो जाये….तो चलिए मिलजुल कर कुछ सोचे…

के द्वारा: aditi kailash aditi kailash

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